अयोध्या में महारानी हो की 10 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह भारत और दक्षिण कोरिया के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक मानी जा रही है।
अयोध्या की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण अध्याय को नई पहचान मिली है। अयोध्या की राजकुमारी और दक्षिण कोरिया की महारानी हो की कांस्य प्रतिमा का शहर में औपचारिक रूप से अनावरण किया गया। खराब मौसम के कारण कोरिया का प्रतिनिधिमंडल अयोध्या नहीं पहुंच सका, जिसके बाद यह दायित्व अयोध्या नगर निगम के महापौर महंत गिरीश पति त्रिपाठी ने निभाया।
करीब 10 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा
कांसे से निर्मित महारानी हो की यह प्रतिमा लगभग 10 फीट ऊंची है। इसे अयोध्या और कोरिया के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों की स्मृति के रूप में स्थापित किया गया है। प्रशासनिक स्तर पर इसे प्रतीकात्मक धरोहर माना जा रहा है, जो दोनों देशों के प्राचीन संबंधों को दर्शाती है।

2000 वर्ष पुरानी मान्यता से जुड़ा ऐतिहासिक संदर्भ
उपलब्ध ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग 2000 वर्ष पूर्व अयोध्या की राजकुमारी हो समुद्री मार्ग से कोरिया गई थीं। वहां उनका विवाह करक वंश के राजकुमार से हुआ, जिसके बाद वे कोरिया की महारानी बनीं। इसी मान्यता के कारण अयोध्या और कोरिया के बीच सांस्कृतिक संबंधों को विशेष महत्व दिया जाता है।
1999 में रखी गई थी पार्क की नींव
महारानी हो की स्मृति में विकसित इस पार्क का शिलान्यास वर्ष 1999 में किया गया था। अयोध्या विकास प्राधिकरण, नगर निगम और कोरिया के सहयोग से समय-समय पर पार्क का विस्तार और सौंदर्यीकरण किया गया। प्रशासन के अनुसार, पार्क को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए चरणबद्ध विकास कार्य जारी रहेंगे।
भारत–कोरिया संबंधों के लिए सांस्कृतिक संदेश
यह प्रतिमा और पार्क अयोध्या की ऐतिहासिक पहचान को मजबूत करने के साथ-साथ भारत और दक्षिण कोरिया के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को भी रेखांकित करते हैं। माना जा रहा है कि इससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।
निष्कर्ष
महारानी हो की कांस्य प्रतिमा का अनावरण अयोध्या के वैश्विक सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाता है। आने वाले समय में पार्क के विकास कार्य पूरे होने के बाद यह स्थल ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय मैत्री का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।





