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सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को स्वीकार किया, विवाद बढ़ा
5 मिनट न्यूज़28 दिसंबर 2025

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को स्वीकार किया, विवाद बढ़ा

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सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मान्यता दी। पर्यावरण समूहों और नागरिक संगठनों ने पुनर्विचार की मांग की। फैसले का असर पर्यावरण और स्थानीय जनता पर पड़ सकता है।

अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा: कानूनी, पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टि से विस्तृत मार्गदर्शिका (2025–2026)

प्रस्तावना: अरावली की अहमियत और विवाद का प्रारंभ

अरावली पहाड़ियाँ भारत की सबसे पुरानी पर्वतीय श्रृंखलाओं में से एक हैं। ये केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, जल संरक्षण और जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण केंद्र हैं। अरावली का क्षेत्र राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और गुजरात तक फैला हुआ है, और यह हजारों साल से स्थानीय समुदायों की जीवनशैली, खेती और जल स्रोतों के लिए आधार रहा है。

20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मान्यता देने के बाद विवाद और चर्चा तेज़ हो गई। कोर्ट ने निर्धारित किया कि अब केवल वे भू-आकृतियाँ अरावली मानी जाएँगी जिनकी ऊँचाई आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक हो। इस फैसले ने पर्यावरण समूहों, नागरिक संगठनों और स्थानीय प्रशासन के लिए कई नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं。

यह मार्गदर्शिका इस फैसले का विस्तृत विश्लेषण, समयरेखा, सभी स्टेकहोल्डर्स का दृष्टिकोण, पर्यावरणीय और नीति निहितार्थ, और वैश्विक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है。

1. ऐतिहासिक और भूगोलिक संदर्भ

अरावली की उत्पत्ति लगभग 15 करोड़ वर्ष पहले हुई थी और इसे भारत की सबसे पुरानी पर्वतीय श्रृंखला माना जाता है। इसकी ऊँचाई सामान्यतः 700–1,722 मीटर के बीच होती है, और यह दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व तक लगभग 800 किलोमीटर लंबी फैली हुई है。

पर्यावरणीय महत्व:

  • वर्षा जल संचयन और भूजल स्तर में सुधार
  • जैव विविधता का संरक्षण, जिसमें कई लुप्तप्राय प्रजातियाँ शामिल हैं
  • मिट्टी कटाव और रेगिस्तानीकरण को रोकना
  • स्थानीय मौसम पर स्थिर प्रभाव

सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व:

  • अनेक प्राचीन किले, मंदिर और धार्मिक स्थल
  • स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण समुदायों की जीवनशैली का आधार
  • कृषि और जल स्रोतों के लिए प्राकृतिक संरचना

इस ऐतिहासिक संदर्भ को समझना आवश्यक है ताकि नई कानूनी परिभाषा के प्रभाव को सही रूप में आंका जा सके।

2. सुप्रीम कोर्ट का फैसला और कानूनी टाइमलाइन

20 नवंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने नई परिभाषा को मान्यता दी。

मुख्य निर्णय:

  • केवल वे भू-आकृतियाँ अरावली मानी जाएँगी जिनकी ऊँचाई आसपास की जमीन से 100 मीटर या अधिक हो।
  • पर्यावरण मंत्रालय द्वारा स्थायी खनन प्रबंधन योजना तैयार होने तक कोई नई खनन पट्टियाँ नहीं दी जाएँगी।
  • प्रशासनिक अधिकारियों को नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर अंतिम निर्णय लेने की शक्ति नहीं दी जाएगी।

28 दिसंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने सुओ मोटो संज्ञान लिया, जिससे मामले की पुनर्सुनवाई की संभावना बनी。

यह निर्णय केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय समुदायों की सुरक्षा, भूमि उपयोग, और विकास परियोजनाओं पर सीधा प्रभाव डालता है।

3. विवाद और पुनर्विचार की मांग

इस फैसले को लेकर कई पर्यावरण समूहों, नागरिक संगठनों और विपक्षी दलों ने पुनर्विचार की मांग की। उनका तर्क यह है कि छोटी पहाड़ियाँ भी जल संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण हैं।

प्रमुख आंदोलन और संगठन:

  • 'अरावली विरासत जन अभियान'
  • 'वाटरमैन ऑफ इंडिया' – राजेंद्र सिंह

इन समूहों ने कोर्ट से आग्रह किया कि छोटी पहाड़ियों की सुरक्षा और पारिस्थितिक महत्व को ध्यान में रखते हुए नई परिभाषा को संशोधित किया जाए।

4. पर्यावरणीय प्रभाव का विश्लेषण

नई परिभाषा के संभावित प्रभाव:

  • कई छोटी पहाड़ियाँ कानूनी सुरक्षा से बाहर आ सकती हैं।
  • खनन और निर्माण गतिविधियों में वृद्धि हो सकती है।
  • स्थानीय जल स्रोत, नदी प्रवाह और जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव।
  • वन्य जीवन और पक्षियों के आवास पर खतरा।

विशेषज्ञ दृष्टिकोण: पर्यावरणविदों का मानना है कि भले ही ऊँचाई मापदंड स्पष्ट हो, पारिस्थितिक संतुलन केवल ऊँचाई पर निर्भर नहीं करता। छोटी पहाड़ियों और पठारों का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है।

5. स्टेकहोल्डर्स का दृष्टिकोण

सरकारी दृष्टिकोण:

  • अदालत द्वारा दी गई नई परिभाषा के अनुसार प्रशासन को नियमों का पालन करना होगा।
  • पर्यावरण मंत्रालय खनन प्रबंधन योजना तैयार कर रहा है।
  • स्थानीय प्रशासन भूमि उपयोग और विकास परियोजनाओं में निर्देशित कदम उठा रहा है।

स्थानीय समुदाय:

  • कई किसानों और ग्रामीणों को भूमि उपयोग और निर्माण योजनाओं में अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।
  • जल स्रोत और कृषि उत्पादन पर संभावित प्रभाव।

पर्यावरण समूह:

  • छोटी पहाड़ियों की पारिस्थितिक सुरक्षा पर जोर।
  • सार्वजनिक जागरूकता और आंदोलन के माध्यम से पुनर्विचार की मांग।

6. नीति और कानूनी निहितार्थ

नई परिभाषा केवल भू-आकृति को परिभाषित नहीं करती, बल्कि राज्य और केंद्र की नीति, खनन नियंत्रण, निर्माण अनुमति और संरक्षण कार्यक्रम को भी प्रभावित करती है।

मुख्य निहितार्थ:

  • खनन उद्योग में अस्थायी रोक।
  • राज्य और केंद्रीय स्तर पर नियमों का पुनरावलोकन।
  • पर्यावरणीय Impact Assessment (EIA) के लिए नई गाइडलाइन।
  • स्थानीय विकास परियोजनाओं में अनुमति प्रक्रियाओं का संशोधन।

7. वैश्विक दृष्टिकोण: पर्वतीय संरक्षण के उदाहरण

यूरोप:

अल्प्स पर्वत क्षेत्र में ऊँचाई, जैव विविधता और पर्यटन के आधार पर सख्त संरक्षण कानून।

अमेरिका:

रॉकी माउंटेन क्षेत्र में National Park और Wilderness Act के अंतर्गत छोटे पठार और घाटियाँ भी संरक्षित।

चीन और नेपाल:

हिमालयी क्षेत्र में छोटे-पर्वतीय ढाँचे और जल स्रोत को संरक्षित रखने के लिए स्थानीय और राष्ट्रीय नियम।

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि वैश्विक दृष्टिकोण में केवल ऊँचाई पर निर्भर न होकर पूरी पारिस्थितिक प्रणाली का संरक्षण किया जाता है।

8. समयरेखा और अगले कदम

  • अक्टूबर 2025: पर्यावरण मंत्रालय ने नई खनन नीति तैयार की。
  • 20 नवंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने नई परिभाषा को मान्यता दी。
  • 28 दिसंबर 2025: सुओ मोटो संज्ञान लिया गया。
  • 2026–2027: पर्यावरण मंत्रालय स्थायी खनन प्रबंधन योजना तैयार करेगा。
  • 2027 और आगे: संभावित पुनर्सुनवाई, नीति संशोधन और सार्वजनिक परामर्श。

समयरेखा से यह स्पष्ट होता है कि अरावली संरक्षण में निर्णय और नीति लगातार विकसित हो रही है, और स्थानीय समुदाय, पर्यावरण समूह और सरकार के बीच संवाद महत्वपूर्ण है।

9. Case Studies: अरावली संरक्षण और विवाद

1. Gurgaon/Manesar खनन विवाद:

  • कई छोटी पहाड़ियों को खनन के लिए चिन्हित किया गया。
  • स्थानीय न्यायालयों ने पर्यावरणीय रिपोर्टों के आधार पर खनन पर रोक लगाई。
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कुछ पहाड़ियाँ अब पूरी तरह कानूनी सुरक्षा से बाहर हैं。

2. Delhi Ridge वॉटरशेड प्रोटेक्शन:

  • दिल्ली रिज़ क्षेत्र में वन संरक्षण और वॉटरशेड सुरक्षा पर विशेष कानून लागू हैं。
  • उच्च न्यायालय के आदेशों ने खनन और निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाई。

यह केस दिखाता है कि छोटी पहाड़ियों का संरक्षण भी महत्वपूर्ण है।

3. Rajasthan जल संरक्षण पहल:

  • पहाड़ी क्षेत्र में जल संरचनाओं का निर्माण और संरक्षण。
  • स्थानीय समुदाय और NGO मिलकर जल स्तर सुधारने में काम कर रहे हैं。

नई परिभाषा के तहत इन पहाड़ियों का कानूनी स्थिति बदल सकती है।

10. निष्कर्ष और भविष्य की दिशा

अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा पर्यावरण, कानूनी और सामाजिक दृष्टि से गहरी प्रभाव डालती है।

मुख्य बिंदु:

  • केवल ऊँचाई पर आधारित परिभाषा छोटे पहाड़ी ढाँचे और पारिस्थितिक स्थलों के लिए खतरा。
  • सुप्रीम कोर्ट का सुओ मोटो संज्ञान भविष्य की सुनवाई की संभावना बनाए रखता है。
  • स्थानीय समुदाय, पर्यावरण समूह और प्रशासन के बीच संतुलन महत्वपूर्ण。
  • वैश्विक दृष्टिकोण में केवल ऊँचाई पर निर्भर न होकर पूरी पारिस्थितिक प्रणाली को संरक्षित किया जाता है。

आने वाले वर्षों में अरावली संरक्षण, नीति निर्माण और कानूनी विवाद लगातार विकसित होते रहेंगे। यह न केवल पर्यावरणीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि स्थानीय जीवन, जल स्रोत और जैव विविधता के लिए भी अहम है।

इस विस्तृत मार्गदर्शिका से यह स्पष्ट होता है कि अरावली पहाड़ियों का संरक्षण केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और स्थानीय विकास, पर्यावरण और सामाजिक संतुलन का मामला है।

FAQs

Q1. अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा दी। अब केवल वे भू-आकृतियाँ अरावली मानी जाएँगी जिनकी ऊँचाई आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक हो。

Q2. नई परिभाषा का पर्यावरण पर क्या असर हो सकता है?

छोटी पहाड़ियाँ कानूनी सुरक्षा से बाहर आ सकती हैं, जिससे खनन और निर्माण गतिविधियों में वृद्धि हो सकती है। यह स्थानीय जल स्रोत, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

Q3. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के बाद क्या निर्देश दिए हैं?

कोर्ट ने स्थायी खनन प्रबंधन योजना तैयार होने तक कोई नई खनन पट्टियाँ जारी न करने और प्रशासनिक अधिकारियों को नागरिकों के अधिकारों पर अंतिम निर्णय न लेने के निर्देश दिए हैं।

Q4. क्या छोटी पहाड़ियाँ भी अरावली की सुरक्षा में महत्वपूर्ण हैं?

हां, पर्यावरणविदों का कहना है कि ऊँचाई केवल एक मापदंड है। छोटी पहाड़ियाँ भी जल संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय इकोसिस्टम के लिए अहम हैं।

Q5. कौन से संगठन और आंदोलन इस फैसले का विरोध कर रहे हैं?

‘अरावली विरासत जन अभियान’ और ‘वाटरमैन ऑफ इंडिया’ जैसे संगठन कोर्ट से पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं。

Q6. सुप्रीम कोर्ट का सुओ मोटो संज्ञान क्या है?

28 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने अपने आदेश का सुओ मोटो संज्ञान लिया। इसका मतलब है कि कोर्ट स्वयं इस मामले की पुनर्सुनवाई कर सकता है।

Q7. नई परिभाषा के बाद खनन उद्योग पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

स्थायी खनन प्रबंधन योजना बनने तक नए खनन पट्टे नहीं दिए जाएंगे। इससे खनन गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगेगी।

Q8. स्थानीय समुदायों पर इसका क्या असर होगा?

कानूनी रूप से सुरक्षा से बाहर हुई छोटी पहाड़ियों पर निर्माण और खनन से स्थानीय किसानों और ग्रामीणों की जमीन और जल स्रोत प्रभावित हो सकते हैं।

Q9. वैश्विक स्तर पर पर्वतीय संरक्षण के क्या उदाहरण हैं?

यूरोप में अल्प्स, अमेरिका में रॉकी माउंटेन और चीन/नेपाल में हिमालयी क्षेत्रों में छोटे-पर्वतीय ढाँचे भी संरक्षित किए जाते हैं।

Q10. भविष्य में अरावली संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

पुनर्विचार सुनवाई, नीति संशोधन, सार्वजनिक परामर्श और पर्यावरणीय Impact Assessment (EIA) जैसी प्रक्रियाएँ अपनाई जा सकती हैं।