2026 विधानसभा चुनाव में तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में सियासी मुकाबला। जानिए राज्यवार मुद्दे और महत्व।
2026 विधानसभा चुनाव: पांच राज्यों में सियासी परीक्षा, क्षेत्रीय मुद्दों से तय होगी राजनीति की दिशा
2026 के विधानसभा चुनाव केवल सरकारें बदलने का सवाल नहीं हैं, बल्कि यह भी तय करेंगे कि अलग-अलग राज्यों में जनता अब किन मुद्दों को सबसे ऊपर रख रही है। संवैधानिक कार्यकाल के अनुसार तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में प्रस्तावित ये चुनाव क्षेत्रीय राजनीति की दिशा के साथ-साथ राष्ट्रीय सियासी माहौल पर भी असर डाल सकते हैं।
हर राज्य की सामाजिक बनावट, राजनीतिक परंपरा और मौजूदा हालात अलग हैं—और यही वजह है कि इस बार मुकाबले एक जैसे नहीं, बल्कि बहुस्तरीय नजर आ रहे हैं।
तमिलनाडु: द्रविड़ राजनीति की कसौटी पर सत्ता
तमिलनाडु की राजनीति दशकों से द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही है। फिलहाल डीएमके सत्ता में है और सामाजिक न्याय, भाषा सम्मान तथा कल्याणकारी योजनाएं उसकी राजनीति का आधार बनी हुई हैं।
वहीं एआईएडीएमके संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व संतुलन पर दोबारा फोकस कर रही है। भाजपा भी अपने विस्तार की कोशिश में है, लेकिन उपलब्ध राजनीतिक संकेतों के अनुसार चुनावी मुकाबले का केंद्र अभी भी द्रविड़ दलों के बीच ही बना हुआ है। बेरोजगारी, शहरी विकास, औद्योगिक निवेश और केंद्र–राज्य संबंध ऐसे मुद्दे हैं, जो मतदाताओं के फैसले को दिशा दे सकते हैं।
केरल: परंपरा बनाम प्रदर्शन की सीधी टक्कर
केरल उन राज्यों में शामिल है जहां सत्ता परिवर्तन की परंपरा लंबे समय से देखी जाती रही है। मौजूदा समय में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार में है, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) मुख्य विपक्ष की भूमिका निभा रहा है।
शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, प्रवासी अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रबंधन जैसे विषय चुनावी बहस में प्रमुख रह सकते हैं। भाजपा राज्य में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने का प्रयास कर रही है, हालांकि केरल की राजनीति की मुख्य धुरी अब भी एलडीएफ और यूडीएफ के बीच ही केंद्रित दिखाई देती है।
पश्चिम बंगाल: मजबूत सत्ता, तेज विपक्ष
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस लगातार तीसरे कार्यकाल में है। हालिया चुनावी रुझानों के आधार पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ मजबूत मानी जाती है, खासकर ग्रामीण इलाकों और महिला मतदाताओं के बीच।
दूसरी ओर, भाजपा खुद को प्रमुख विपक्ष के रूप में स्थापित करने की कोशिश में है। कानून-व्यवस्था, केंद्रीय योजनाओं का लाभ, रोजगार और औद्योगिक निवेश जैसे मुद्दे चुनावी चर्चा में अहम रह सकते हैं। इसके साथ-साथ केंद्र और राज्य के बीच संबंध भी बंगाल की राजनीति में एक प्रभावी कारक बने हुए हैं।
असम: स्थानीय मुद्दों में उलझी बड़ी राजनीति
असम को पूर्वोत्तर भारत की राजनीति का प्रवेश द्वार माना जाता है। यहां भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में है। नागरिकता से जुड़े सवाल, बाढ़ और आपदा प्रबंधन, चाय बागान मजदूरों की स्थिति और बुनियादी ढांचे का विकास लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहते हैं।
असम की राजनीति में जातीय, भाषाई और क्षेत्रीय संतुलन बेहद अहम होता है, जिससे चुनावी रणनीति यहां ज्यादा स्थानीय और जमीनी नजर आती है।
पुडुचेरी: सीमित सीटें, लेकिन संकेत बड़े
पुडुचेरी भले ही आकार में छोटा केंद्र शासित प्रदेश हो, लेकिन यहां के चुनावी नतीजों को राष्ट्रीय दल प्रतीकात्मक महत्व देते हैं। गठबंधन सरकारों का इतिहास और प्रशासनिक स्थिरता यहां लंबे समय से अहम मुद्दा रहे हैं। स्थानीय विकास, रोजगार और केंद्र–प्रदेश समन्वय जैसे सवाल मतदाताओं की प्राथमिकताओं में शामिल रह सकते हैं।
जनता के लिए क्या मायने रखता है यह चुनाव
इन पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े नीतिगत फैसलों को सीधे प्रभावित करेंगे। साथ ही, 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ये नतीजे राजनीतिक दलों को यह संकेत भी देंगे कि जनता किन मुद्दों पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रही है।
निष्कर्ष
2026 के विधानसभा चुनाव क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रीय रणनीतियों के बीच संतुलन की अहम कसौटी हैं। हर राज्य की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन एक रुझान साफ दिखता है—मतदाता अब केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि शासन के वास्तविक असर से अपना फैसला तय करने लगे हैं। आने वाले महीनों में चुनावी तस्वीर और स्पष्ट होगी, और इसके नतीजे देश की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित कर सकते हैं।





