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ममता बनर्जी की जीवनी: संघर्ष, जनआंदोलन और बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
बायोग्राफी21 दिसंबर 2025

ममता बनर्जी की जीवनी: संघर्ष, जनआंदोलन और बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने तक का सफर

Chief Editor

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ममता बनर्जी का जीवन संघर्ष, छात्र राजनीति, जनआंदोलनों और पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने की कहानी है। जानिए 2025 तक उनके योगदान और जनजीवन पर असर।

ममता बनर्जी: संघर्ष, सत्ता और बंगाल की राजनीति में बदलती दिशा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का नाम किसी एक चुनाव, एक सरकार या एक आंदोलन तक सीमित नहीं है। यह नाम पिछले चार दशकों से राज्य की राजनीतिक चेतना, जनआंदोलनों और सत्ता संतुलन से जुड़ा रहा है। 2025 में, जब बंगाल सामाजिक कल्याण, औद्योगिक निवेश और केंद्र–राज्य संबंधों को लेकर चर्चा में है, ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आता है।

उनकी राजनीति ने यह दिखाया कि सत्ता तक पहुंचने का रास्ता सिर्फ संगठनात्मक ताकत या संसदीय गणित से नहीं बनता, बल्कि जमीन से जुड़े संघर्ष, निरंतर मौजूदगी और जनता के भरोसे से भी बनता है।

साधारण परिवार से सार्वजनिक जीवन तक

ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी 1955 को कोलकाता में हुआ। परिवार मध्यमवर्गीय था और संसाधन सीमित। पिता प्रमिलेश्वर बनर्जी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे, लेकिन उनका निधन ममता की किशोरावस्था में हो गया। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी सीधे उन पर आ गई।

कम उम्र में काम करना, पढ़ाई के साथ घर चलाना और आर्थिक असुरक्षा से जूझना—ये अनुभव उनके जीवन का हिस्सा बने। बाद के वर्षों में उनकी राजनीति में जो जिद, आत्मनिर्भरता और टकराव की क्षमता दिखती है, उसकी जड़ें इसी दौर में मिलती हैं।

शिक्षा और सोच का निर्माण

ममता बनर्जी ने देशबंधु शिशु विद्यालय से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद कोलकाता विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक और इस्लामिक इतिहास में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। उन्होंने B.Ed. और LL.B. की डिग्री भी हासिल की।

इतिहास और कानून की पढ़ाई ने उन्हें सत्ता, अधिकार और सामाजिक ढांचे को समझने की दृष्टि दी। उनकी राजनीति में बार-बार दिखने वाली “संवैधानिक भाषा” और “अधिकार आधारित तर्क” इसी शैक्षणिक पृष्ठभूमि से जुड़ी रही।

छात्र राजनीति: पहली पहचान

ममता बनर्जी ने लगभग 15 वर्ष की उम्र में छात्र राजनीति में कदम रखा। जोगमाया देवी कॉलेज में छात्र परिषद की स्थापना उनके शुरुआती संगठनात्मक प्रयासों में शामिल रही। 1970 के दशक का बंगाल राजनीतिक रूप से बेहद सक्रिय था और छात्र आंदोलनों का व्यापक प्रभाव था।

इसी दौर में उन्होंने नेतृत्व करना, विरोध दर्ज कराना और भीड़ के बीच अपनी बात रखना सीखा। 1976 में वे पश्चिम बंगाल महिला कांग्रेस की महासचिव बनीं। यहां से उनका राजनीतिक सफर औपचारिक रूप से राज्य स्तर पर शुरू हुआ।

1984: संसद तक पहुंच

1984 का लोकसभा चुनाव ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का बड़ा मोड़ माना जाता है। उन्होंने अनुभवी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर संसद में प्रवेश किया। यह जीत प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे यह संकेत मिला कि बंगाल की राजनीति में एक नई पीढ़ी उभर रही है।

संसद में उनकी पहचान एक मुखर और सवाल उठाने वाली सांसद के रूप में बनी। वे पार्टी लाइन से इतर मुद्दों पर भी स्पष्ट राय रखने से नहीं हिचकती थीं।

केंद्र सरकार और असहमतियाँ

केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों के दौरान ममता बनर्जी ने कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। रेलवे मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल खास तौर पर चर्चा में रहा, जहां उन्होंने यात्री सुविधाओं और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी पर जोर दिया।

हालांकि, सत्ता में रहते हुए भी उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ते गए। नीति और निर्णय प्रक्रिया को लेकर असहमति ने धीरे-धीरे उनके अलग राजनीतिक रास्ते को स्पष्ट कर दिया।

तृणमूल कांग्रेस: अलग पहचान की कोशिश

1998 में ममता बनर्जी ने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। उस समय पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा का लंबा शासन था और विपक्ष कमजोर माना जाता था। सीमित संसाधनों और संगठन के बावजूद तृणमूल कांग्रेस ने खुद को एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच के रूप में पेश किया।

पार्टी की राजनीति का आधार कैडर संरचना से ज्यादा जनसंपर्क और आंदोलन रहे। “दिल्ली नहीं, बंगाल” का संदेश धीरे-धीरे पार्टी की पहचान बना।

सिंगुर और नंदीग्राम: निर्णायक संघर्ष

2006–07 में सिंगुर और नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए आंदोलनों ने बंगाल की राजनीति को निर्णायक मोड़ दिया। किसानों के साथ खड़े होकर ममता बनर्जी ने सड़क से विधानसभा तक संघर्ष किया।

इन आंदोलनों के दौरान अनशन, धरना और पुलिस कार्रवाई जैसी घटनाएं हुईं। इससे ममता बनर्जी की छवि एक ऐसी नेता की बनी जो सत्ता से ज्यादा जमीन से जुड़ी है। वाम मोर्चा सरकार की जनस्वीकृति पर इसका गहरा असर पड़ा।

2011: सत्ता परिवर्तन

2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 34 वर्षों के वाम शासन को समाप्त किया। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। यह बदलाव सिर्फ सत्ता का नहीं था, बल्कि शासन की शैली में भी परिवर्तन का संकेत था।

सरकार की प्राथमिकताओं में जनसुनवाई, सामाजिक सुरक्षा और प्रशासनिक सक्रियता शामिल रही।

शासन के शुरुआती वर्ष

पहले कार्यकाल में सरकार को आर्थिक दबाव और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। फिर भी ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक योजनाओं पर जोर दिया गया।

धीरे-धीरे सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं के जरिए सीधे लाभार्थियों तक पहुंच बनाने की कोशिश की।

लगातार जनादेश और राजनीतिक मजबूती

2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को फिर से जनादेश मिला। 2021 का चुनाव खास तौर पर चर्चा में रहा, जहां राष्ट्रीय राजनीति का दबाव भी स्पष्ट था।

इस जीत के बाद ममता बनर्जी की भूमिका केवल राज्य तक सीमित नहीं रही। राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति में भी उनका नाम प्रमुखता से लिया जाने लगा।

जनकल्याण योजनाएँ और सामाजिक असर

लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री प्रकल्प, खाद्य साथी और कर्मश्री जैसी योजनाओं ने महिलाओं, ग्रामीण आबादी और कमजोर वर्गों को सीधे प्रभावित किया। इन योजनाओं ने राज्य की सामाजिक संरचना में हस्तक्षेप किया और सरकार के साथ जनता का सीधा संबंध मजबूत किया।

आर्थिक नीति और निवेश प्रयास

उद्योग और निवेश के सवाल पर सरकार ने संतुलन की नीति अपनाने की कोशिश की। बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट जैसे मंचों के जरिए निवेश आकर्षित करने का प्रयास हुआ, जबकि भूमि अधिकार और स्थानीय हितों पर सावधानी बरती गई।

केंद्र–राज्य संबंध और संघीय राजनीति

ममता बनर्जी ने कई मौकों पर राज्यों के अधिकारों और संघीय ढांचे पर जोर दिया। केंद्र सरकार के साथ टकराव और संवाद—दोनों उनकी राजनीति का हिस्सा रहे। यह रुख उन्हें राष्ट्रीय बहसों में भी प्रासंगिक बनाता रहा।

राजनीति से परे व्यक्तित्व

राजनीति के अलावा ममता बनर्जी लेखन और चित्रकला में सक्रिय हैं। उनकी सादगी, सूती साड़ी और सीधे संवाद की शैली उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान देती है। सार्वजनिक जीवन में यह छवि उनके राजनीतिक ब्रांड का हिस्सा बन चुकी है।

चुनावी समय में प्रासंगिकता

चुनावी दौर में ममता बनर्जी की जीवनी सिर्फ अतीत की कहानी नहीं रहती, बल्कि वर्तमान राजनीति को समझने का संदर्भ बनती है। उनके संघर्ष, आंदोलनों और शासन का अनुभव मतदाताओं के लिए एक निरंतर तुलना का आधार देता है।

वर्तमान और आगे की दिशा

2025 में ममता बनर्जी का फोकस बुनियादी ढांचे, सामाजिक सुरक्षा और राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने पर है। राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका पर चर्चा जारी है, लेकिन बंगाल उनकी राजनीति का केंद्र बना हुआ है।

समापन

ममता बनर्जी का राजनीतिक जीवन भारतीय लोकतंत्र में संघर्ष आधारित नेतृत्व का उदाहरण है। उनके फैसलों और नीतियों पर बहस संभव है, लेकिन यह स्पष्ट है कि उन्होंने पश्चिम बंगाल की राजनीति की भाषा, दिशा और प्राथमिकताओं को स्थायी रूप से प्रभावित किया है।

FAQ

ममता बनर्जी कौन हैं?

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख नेता हैं। वे राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं।

ममता बनर्जी का जन्म कब हुआ था?

उनका जन्म 5 जनवरी 1955 को कोलकाता में हुआ था।

ममता बनर्जी की शिक्षा क्या है?

उन्होंने इतिहास में स्नातक, इस्लामिक इतिहास में स्नातकोत्तर, B.Ed. और LL.B. की पढ़ाई की है।

ममता बनर्जी ने राजनीति की शुरुआत कैसे की?

उन्होंने छात्र राजनीति से शुरुआत की और 15 वर्ष की उम्र में सक्रिय रूप से आंदोलनों में शामिल हुईं।

ममता बनर्जी पहली बार सांसद कब बनीं?

वे 1984 में पहली बार लोकसभा सांसद बनीं।

तृणमूल कांग्रेस की स्थापना कब हुई?

अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1998 में हुई थी।

सिंगुर आंदोलन में ममता बनर्जी की क्या भूमिका थी?

उन्होंने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के समर्थन में आंदोलन का नेतृत्व किया।

ममता बनर्जी मुख्यमंत्री कब बनीं?

वे 2011 में पहली बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं।

ममता बनर्जी कितनी बार मुख्यमंत्री चुनी गई हैं?

वे 2011, 2016 और 2021 में तीन बार मुख्यमंत्री चुनी गई हैं।

ममता बनर्जी की प्रमुख योजनाएँ कौन-सी हैं?

लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री प्रकल्प और खाद्य साथी उनकी प्रमुख योजनाएँ हैं।

ममता बनर्जी को ‘दीदी’ क्यों कहा जाता है?

उनकी सादगी और आम लोगों से सीधे जुड़ाव के कारण समर्थक उन्हें ‘दीदी’ कहते हैं।

क्या ममता बनर्जी लेखक भी हैं?

हाँ, उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं और चित्रकला में भी सक्रिय हैं।