सौरभ द्विवेदी का जीवन परिचय: बुंदेलखंड से जेएनयू और द लल्लनटॉप तक का सफर। उनकी पत्रकारिता, इंटरव्यू शैली और इस्तीफे के बाद की संभावनाएं।
सौरभ द्विवेदी: डिजिटल दौर में हिंदी पत्रकारिता को संदर्भ और भरोसा देने वाली पहचान
डिजिटल दौर में जब खबरें तेज़ी से स्क्रोल होती हैं और राय, सूचना पर भारी पड़ती दिखती है, सौरभ द्विवेदी का नाम हिंदी पत्रकारिता में ठहराव और संदर्भ के साथ लिया जाता है। उन्होंने यह दिखाया कि डिजिटल मंच पर भी भाषा, तैयारी और ज़मीनी समझ से भरोसा बनाया जा सकता है।
संक्षेप में—सौरभ द्विवेदी का पत्रकारिता सफर इस बात का उदाहरण है कि माध्यम चाहे बदल जाए, लेकिन अगर सवाल, संदर्भ और जिम्मेदारी बनी रहे, तो पत्रकारिता का मूल चरित्र कायम रहता है।
बुंदेलखंड की जमीन से निकली समझ
उत्तर प्रदेश के जालौन ज़िले के ओरई कस्बे में जन्मे सौरभ द्विवेदी का शुरुआती जीवन बुंदेलखंड की सामाजिक परिस्थितियों के बीच बीता। यह वह इलाका है जहां पानी, खेती, पलायन और स्थानीय राजनीति रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा रहे हैं। इसी माहौल ने समाज को देखने की एक व्यावहारिक और संवेदनशील दृष्टि उनके भीतर विकसित की।
उपलब्ध सार्वजनिक जानकारियों के अनुसार, उनके पिता शिक्षक रहे और सामाजिक विषयों में रुचि रखते थे। घर के भीतर किताबें, अख़बार और सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा का माहौल रहा। यही कारण है कि आगे चलकर उनकी पत्रकारिता में सत्ता, समाज और आम लोगों के सवाल एक साथ दिखाई देते हैं।
शिक्षा: साहित्य और समाज की संगति
उच्च शिक्षा के लिए सौरभ द्विवेदी दिल्ली आए और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए, एमफिल और पीएचडी की पढ़ाई की। जेएनयू का अकादमिक वातावरण केवल डिग्री तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इतिहास, राजनीति और समाज को जोड़कर देखने की दृष्टि देता है।
पत्रकारिता की व्यावहारिक ट्रेनिंग उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से ली। यहां समाचार लेखन, रिपोर्टिंग और संपादन की पेशेवर समझ बनी। साहित्य की पृष्ठभूमि और मीडिया की ट्रेनिंग—दोनों का संतुलन उनकी भाषा और प्रस्तुति में साफ दिखाई देता है।
न्यूज़रूम से डिजिटल की ओर बढ़ता सफर
पेशेवर करियर की शुरुआत में सौरभ द्विवेदी ने प्रिंट और टेलीविजन—दोनों माध्यमों में काम किया। दैनिक भास्कर, स्टार न्यूज़ (अब एबीपी न्यूज़) और इंडिया टुडे ग्रुप जैसे संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने न्यूज़रूम की गति, दबाव और सीमाओं को नज़दीक से देखा।
इसी दौर में यह स्पष्ट हुआ कि हिंदी पत्रकारिता के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल विकल्प नहीं, बल्कि एक नई संभावना हो सकता है—बशर्ते कंटेंट को हल्के मनोरंजन तक सीमित न रखा जाए।
द लल्लनटॉप: भाषा और प्रयोग का डिजिटल मंच
2016 में द लल्लनटॉप की शुरुआत एक छोटे डिजिटल प्रयोग के रूप में हुई। नाम जानबूझकर बोलचाल का चुना गया, ताकि खबरें आम भाषा में आम लोगों तक पहुंच सकें।
लल्लनटॉप की पहचान बनी—खबर को कहानी की तरह कहना, लेकिन तथ्य और संदर्भ के साथ। भारी शब्दावली से दूर, लेकिन विषय की गंभीरता बनाए रखना इसकी खासियत रही। सौरभ द्विवेदी की सहज प्रस्तुति और बिना बनावट का संवाद धीरे-धीरे दर्शकों से जुड़ता गया।
चुनावी कवरेज और ज़मीनी रिपोर्टिंग
2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान लल्लनटॉप की ग्राउंड रिपोर्टिंग ने डिजिटल पत्रकारिता में अलग पहचान बनाई। गांवों और कस्बों में जाकर मतदाताओं से बातचीत, स्थानीय मुद्दों पर फोकस और सत्ता से सीधे सवाल—यह सब मोबाइल स्क्रीन पर नया अनुभव था।
‘पॉलिटिकल किस्सा’ जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए राजनीति के इतिहास और वर्तमान को सरल भाषा में समझाने का प्रयास किया गया, जिसे दर्शकों ने व्यापक रूप से अपनाया।
इंटरव्यू का तरीका: टकराव नहीं, संवाद
सौरभ द्विवेदी की इंटरव्यू शैली आमतौर पर आक्रामक नहीं मानी जाती। वे सवाल पूछते समय पृष्ठभूमि रखते हैं और बातचीत को धीरे-धीरे गहराई तक ले जाने की कोशिश करते हैं।
‘द गेस्ट इन द न्यूज़रूम’ जैसे फॉर्मैट्स में यह साफ दिखता है कि उद्देश्य केवल हेडलाइन बनाना नहीं, बल्कि विषय को समझना और समझाना है।
भाषा, तैयारी और प्रस्तुति
उनकी पत्रकारिता की सबसे अलग पहचान भाषा है। शुद्ध हिंदी के साथ स्थानीय बोलियों का संतुलित इस्तेमाल जटिल राजनीतिक मुद्दों को भी सहज बना देता है। बिना टेलीप्रॉम्प्टर लंबे वीडियो रिकॉर्ड करना उनकी प्रस्तुति को स्वाभाविक बनाता है।
उपलब्ध इंटरव्यूज़ के अनुसार, वे किसी भी रिकॉर्डिंग से पहले विषय की गहन तैयारी को प्राथमिकता देते हैं, जिससे बातचीत सतही नहीं रहती।
डिजिटल प्रभाव और दर्शकों से रिश्ता
द लल्लनटॉप आज हिंदी डिजिटल न्यूज़ स्पेस में एक स्थापित नाम माना जाता है। इसकी मौजूदगी यह संकेत देती है कि हिंदी में गंभीर, संदर्भ-आधारित पत्रकारिता के लिए भी दर्शक मौजूद हैं।
खास बात यह रही कि मंच ने केवल खबरें परोसने के बजाय दर्शकों से संवाद का रिश्ता बनाया। टिप्पणियों, फीडबैक और ज़मीनी सवालों ने कंटेंट की दिशा तय करने में भूमिका निभाई। यह रिश्ता डिजिटल मीडिया में भरोसे का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
हालिया संदर्भ और पेशेवर बदलाव
हाल के समय में सौरभ द्विवेदी ने द लल्लनटॉप के एडिटर-इन-चीफ पद से अलग होने का फैसला लिया। इसे किसी विवाद से जोड़ने के बजाय मीडिया जगत में एक स्वाभाविक पेशेवर बदलाव के रूप में देखा गया।
डिजिटल मीडिया में संस्थापक-संपादकों का आगे बढ़ना नए प्रयोगों और नई भूमिकाओं की ओर इशारा करता है।
सार्वजनिक महत्व और प्रभाव
डिजिटल दौर में, जहां सनसनी और गति हावी रहती है, वहां सौरभ द्विवेदी का काम संतुलन का उदाहरण माना जाता है। खासकर छोटे शहरों और कस्बों से आने वाले युवा पत्रकार उनकी भाषा, तैयारी और ज़मीनी दृष्टि को सीखने योग्य मानते हैं।
सूचना-आधारित समापन
सौरभ द्विवेदी का सफर किसी एक मंच तक सीमित नहीं है। यह हिंदी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को समझने का एक उदाहरण है—जहां माध्यम बदला, लेकिन संदर्भ, सवाल और जिम्मेदारी बनी रही।
FAQs
Q1. सौरभ द्विवेदी किस वजह से पहचाने जाते हैं?
हिंदी डिजिटल पत्रकारिता में ज़मीनी रिपोर्टिंग और संदर्भ-आधारित प्रस्तुति के लिए।
Q2. द लल्लनटॉप की शुरुआत कब हुई?
2016 में, एक डिजिटल न्यूज़ प्रयोग के रूप में।
Q3. उनकी शिक्षा का पत्रकारिता पर क्या असर दिखता है?
साहित्य और अकादमिक पृष्ठभूमि उनकी भाषा और विश्लेषण को गहराई देती है।
Q4. उनकी इंटरव्यू शैली कैसी मानी जाती है?
आक्रामक टकराव के बजाय संवाद और पृष्ठभूमि पर आधारित।
Q5. हाल में उन्होंने कौन सा अहम फैसला लिया?
द लल्लनटॉप के एडिटर-इन-चीफ पद से अलग होने का।
Q6. युवाओं और छोटे शहरों के पत्रकार उनके काम से क्या सीख सकते हैं?
यह कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी भाषा, तैयारी और ज़मीनी समझ से भरोसेमंद पत्रकारिता की जा सकती है।






